Saturday, May 14, 2011

विश्वास



ओ ! जीवन के थके पखेरू, बढ़े चलो हिम्मत मत हारो,
पंखों में भविष्य बंदी है मत अतीत की ओर निहारो,
क्या चिंता धरती यदि छूटी उड़ने को आकाश बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है ।

बलवीर सिंह "रंग"

11 comments:

JHAROKHA said...

aadarniy sir
bahut hi sundar aur behad hi aatm-vishwas se bhari prastuti.
har ek panktiyon prabhav purn hain
mere blog par bahut dino baad aane v mera housla badhne ke liye
hardik naman
poonam

Mrs. Asha Joglekar said...

Balweer singh jee ki choti par gyan poorn kawita achchi lagee.

veerubhai said...

क्या चिंता यदि धरती छूते उड़ने को आकाश बहुत है -आशा से भरे स्वर ,भरते जीवन में नए रंग .

Amrita Tanmay said...

पंखों में भविष्य बंदी है.पढ़कर एक मुस्कान सी आ जाती है..सुंदर रचना

Vivek Jain said...

बहुत सुंदर रचना
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Patali-The-Village said...

बहुत सुंदर रचना|धन्यवाद|

वैज्ञानिक प्रार्थना said...

आपके ब्लॉग पर आकर बहुत अच्छा लगा| आपकी भावाभिव्यक्ति बहुत सुन्दर है और सोच गहरी है! लेखन अपने आप में संवेदनशीलता का परिचायक है! शुभकामना और साधुवाद!

"कुछ लोग असाध्य समझी जाने वाली बीमारी से भी बच जाते हैं और इसके बाद वे लम्बा और सुखी जीवन जीते हैं, जबकि अन्य अनेक लोग साधारण सी समझी जाने वाली बीमारियों से भी नहीं लड़ पाते और असमय प्राण त्यागकर अपने परिवार को मझधार में छोड़ जाते हैं! आखिर ऐसा क्यों?"

"एक ही परिवार में, एक जैसा खाना खाने वाले, एक ही छत के नीचे निवास करने वाले और एक समान सुविधाओं और असुविधाओं में जीवन जीने वाले कुछ सदस्य अत्यन्त दुखी, अस्वस्थ, अप्रसन्न और तानवग्रस्त रहते हैं, उसी परिवार के दूसरे कुछ सदस्य उसी माहौल में पूरी तरह से प्रसन्न, स्वस्थ और खुश रहते हैं, जबकि कुछ या एक-दो सदस्य सामान्य या औसत जीवन जी रहे हैं| जो न कभी दुखी दिखते हैं, न कभी सुखी दिखते हैं! आखिर ऐसा क्यों?"

यदि इस प्रकार के सवालों के उत्तर जानने में आपको रूचि है तो कृपया "वैज्ञानिक प्रार्थना" ब्लॉग पर आपका स्वागत है?

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बहुत सुंदर दार्शनिक रचना...

veerubhai said...

आशा विश्वास दो पंख है जीवन की परवाज़ के .सुन्दर प्रस्तुति .

veerubhai said...

मनोहारी गीत .सुन्दर बाल मन की मनोहर प्रस्तुति .

sagar said...

kya kahne sir. gajab likha hai... khubsurat rachana